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मैं शर्मसार मणिपुर हूं….

डा. उरुक्रम शर्मा

मैं शर्मसार मणिपुर हूं…मेरा कतरा कतरा आज शर्म के मारे डूबा जा रहा है…मेरी सुंदरता आज चीख रही है…मेरी हरियाली, मेरे झरने, मेरी नदियां रक्त रंजित हो चुके। मेरे ही दूधमुंहे राक्षस बनकर मेरे स्तनों से खिलवाड़ कर रहे हैं। मुझे निर्वस्त्र करके मेरी आबरू को लूट रहे हैं…मेरी इज्जत सरे आम नीलाम हो रही है…मेरी ही संतानें (कुकी-मैतयी) एक दूसरे के खून के प्यासे हो चुके। आपस में विष घुल चुका…मेरी आबरू  ही बची थी, उसे भी नोचने लगे, मेरी संतानें ही भेडिए हो गए..हैवानियत की हदें पार कर दी…

सारे देश कितने गर्व से कहता था हिन्दुस्तान का मैं स्विटजरलैंड हूं…सुदूर भारत में सुंदरता की अलौकिक छवि हूं। देश दुनिया से सैलानी मेरी खूबसूरती को निहारने आते थे…वो मेरी संतानें ही थी, जो उनका दिल खोलकर अभिनंदन करती थी… कितना खुशनूमा वातावरण था..प्रकृति की सौंंधी महक के आगे केसर कस्तूरी भी शर्माती थी…आज मेरी हर नदी में दूध की जगह खूुन बह रहा है…क्या करूं, अब बचा ही क्या है मेरे पास…मुझे निर्वस्त्र करके सरे बाजार नुमाइश तक कर दी…अपनी मां को नंगा कर दिया…सब संतानें देखती रही…किसी को भी अपने दूध की लाज नहीं आई… कैसे मेरी औलादें इतनी निष्ठुर, कठोर और निर्मयी हो गई…

तिनके तिनके बिखर गई मेरी सुंदर काया…मेरे दूध से खेलने वाली मेरी संतानें ही एक दूसरे के खून के प्यासे हो चुके। मेरा नैसर्गिक शृंगार वैधव्य की तरह कर दिया…अपने ही लोगों की हत्याएं होती देख मेरे पास विधवा विलाप के सिवाय कुछ बचा नहीं है। 

राजा महाराजाओं का शासन देखा है मैंने….तब भी कभी मैं इतनी लज्जित नहीं हुई…मेरी आबरू को गहनों से ज्यादा सहेज कर रखा गया…किसी की हिम्मत तक नहीं होती थी…नजर उठाकर भी देख ले..आज ये तो नहीं…मैं खुद अपनी नजरों से पूरी तरह गिर चुकी…लोक संगीत और पारम्परिक गीतों को खजाना रही हूं। विविधताओं को अक्षुण्ण बना कर रखा है मैंने… गौरवशाली इतिहास, वैविध्य खानपान की अमिट कहानी रही हूं..

.दो दर्जन से ज्यादा जातियों में बंटा मेरा परिवार है…सबका रहना सहन, खानपान, पहनावा सैलानियों को मोहित करता रहा है…मेरे आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता के साथ साथ मेरे यहां नारी का सम्मान साक्षात देवी की तरह होता रहा…अब सब अतीत की बातें हो गई…मैं पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी…मेरे रोम रोम को छिद्रित कर दिया…अब तो मेरी आंखों से आंसुओं ने बहना बंद कर दिया। सब सूख चुके…मेरा सब कुछ खत्म हो गया…मैं मणिपुर हूं, यह भी नहीं कह सकती….

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