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सामाजिक समझौता नहीं, पवित्र संस्कार है विवाह

गणगौर का पर्व

हांरे सुआ माटी की गणगौर कुआं में धमकासा। हां रे सुआ 16 दिनं की गणगौर कुआं म धमकासा। गीत को सुनकर आपको कैसा आभास होता है? भारतीय सनातन संस्कृति समानता, स्वतंत्रता और सामंजस्य पर निर्भर है।

गणगौर जब विसर्जित की जाती है। तब वह अकेली कुएं में नहीं धमकाई जाती है। उसके साथ उसका प्रियतम पति ईसर भी साथ जाता है। ठीक वैसे ही जैसे जब पार्वती सती हो जाती है। तब शिवजी शव के समान हो जाते हैं। पार्वती प्रकृति है तो शिव पुरुष‌। वही सत्य है। सत्य ही सुंदर है। तभी सत्यम शिवम सुंदरम कहा जाता है। गणगौर का पर्व पति पत्नी में प्रेम, सामंजस्य, सहयोग का प्रतीक है। जो स्त्री पुरुष की समानता के सिद्धांत को लेकर चलता है। आज जो संविधान में समानता की बात कही गई है। वह तो हमारे समाज में सनातन काल से ही नहीं आदि काल से चली आ रही है। इसी सनातन परंपरा को सजीव और संजोए हुए गणगौर का पर्व विशेष महत्व रखता है।

 

धैर्य की पर्याय है गणगौर

गीत में आगे कहा गया, नौ मण उलझो सूत, सूत न सुलझासा। क्या एक पुरुष में इतना धैर्य होता है कि वह नौ मण उलझे हुए सूत को सुलझा सके? नहीं पुरुष इतना धैर्यवान नहीं होता। यह धैर्य तो स्त्री में ही होता है। शायद तभी वह होली के दूसरे दिन चैत्र सुदी प्रतिपदा को 16 तार का 16 गांठ का कच्चे सूत से डोरा बनाती है। फिर उसे हल्दी से लपेटती है।

 

हल्दी एक ऐसी औषधि जो पैदा होने से लेकर वृद्धावस्था तक अपना गुणधर्म नहीं छोड़ती। चाहे वह कच्ची हो या पिसी हुई हो। यह सोलह क्या है?

 

सोलह संस्कार भी स्त्री के बिना संपन्न नहीं हो सकते। कुछ बात तो है इसमें। तभी एक गाना बना है 16 बरस की बाली उमर को सलाम।

 

रिश्तो में सामंजस्य का पर्व है गणगौर

पति पत्नी, भाई बहन, पिता बेटी सास बहू, ननंद भोजाई ऐसा कौन सा रिश्तो का रंग नहीं, जो गणगौर के गीतों में नहीं आता? हमने अपने रिश्तो को कितना सहेजा और समारा है! यह उसी का उदाहरण है। सच तो यह है कि खुशियां बांटने से बढ़ती हैं। इसी को लेकर हमने रिश्तो को सजाया और संवारा है।

 

आज के तनाव अवसाद डिप्रेशन से उपजे एकांकीपन में जब कभी नजरें रास्तों से गुजरती गणगौर की सवारी और गणगौर पूजती लड़कियों, नवविवाहिता पर पड़ती है। तब मन स्वत ही प्रफुल्लित हो जाता है। सुबह की सूर्य की किरणों की लालिमा सी सजी-धजी उनकी चुनरी, बाग बगीचे में खिले रंग बिरंगे फूल, हाथ में जल का कलश और उसमें दूब डली हुई  कितनी मनमोहक छवि नजर आती है!

सृष्टि प्रकृति के शृंगार की तरह सजी-धजी यह लड़कियां और स्त्रियां इसके आकर्षण का केंद्र नहीं होती? सृष्टि के सौंदर्य को बनाए रखने प्रकृति की प्रतिमा नारी पूजनीय है। वह धरा की सुंदरता भी है, सौंदर्य और सहनशीलता की मूर्ति भी।

 

क्या चाहिए उसे?

उसे चाहिए आदर, सम्मान अपने स्वाभिमान के लिए तो वह पिता के घर में भी नहीं ठहरती तो फिर आजकल जिस प्रकार घरों में रिश्तो में घरेलू हिंसा, अपमानजनक स्थितियां बनती हैं। उसे वह स्वाभिमानी स्त्री कैसे सहन करेगी? स्वयं के स्वाभिमान, नारीत्व के लिए तो वह कुछ भी करने को तैयार हो जाती है।

 

वह शक्ति भी है दुर्गा और काली भी

यह समाज पर निर्भर है कि उसे नारी का कौन सा रूप चाहिए? सच तो यह है कि गणगौर प्रकृति के सौंदर्य का पर्व है ।

तभी गणगौर के त्योहार को सबसे अधिक लोकगीतों का त्योहार भी कहते हैं। वास्तव में गणगौर देवी का रजो रूप है। तभी इसके गीतों में समस्त इच्छाएं, अभिलाषा और भावनाएं समाएं हुए है।

खोलिए गणगौर माता खोल, किवाड़ी  बाहर पूजन आई पूजन वाली…. कान कंवर सो बीरो मांगा राई सी भोजाई।

इस प्रकार के लोकगीतों से पता चलता है कि भारतीय लड़की ना केवल भाई के लिए अच्छी पत्नी  की कामना करती है बल्कि स्वयं के लिए भी एक सुयोग्य वर की अभिलाषा रखती है। राई का अर्थ है पार्वती जैसी भाभी हों। पार्वती जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने पति के साथ हिमालय की चोटी पर निवास करती हैं। अपने पति के स्वाभिमान और सम्मान के लिए सती हो जाती है। ऐसी पार्वती जैसी भाभी कौन नहीं चाहेगा?

इतिहासकार कर्नल टॉड ने उदयपुर में गणगौर की सवारी देखी तो वह भी अचंभित हो गया। राजसी ठाठ पाठ के साथ सेना और तोपों की सलामी देकर जिस प्रकार से गणगौर की विदाई होती है। वह भाव विभोर करने के साथ-साथ आंखों से आंसू में झलका जाती है।

सच तो यह है कि राजस्थान जैसा रंग रंगीला है ।वैसे ही रंग रंगीले इसके तीज त्योहार और पर्व है। इसी में एक रंग रंगीला पर्व गणगौर का है। गणगौर जो कि चैत्र शुक्ल तृतीया अर्थात चैत्र नवरात्रि के तृतीय दिन पूजी जाती है। सौभाग्य और संतान की दीर्घायु प्राप्ति का भी महापर्व है।

भारत में विवाह एक सामाजिक समझौते का परिणाम नहीं अपितु सनातन संस्कृति और परंपरा का सजीव उदाहरण है। यह एक पवित्र संस्कार है। जो सोलह संस्कारों में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। चार आश्रमों में गृहस्थ आश्रम के महत्व को कौन नहीं जानता?

यह तो वह आश्रम है। जहां से मोक्ष का द्वार भी खुल सकता है। विवाह एक ऐसा संबंध है। जिसमें दो सह शरीर मिलकर एक आत्मा बन जाते है।

गणगौर का पर्व गणगौर गण अर्थात शिव, गौर मतलब पार्वती की पूजा का पर्व है। इन्हें ईसर और गौर भी कहा जाता है।

इस पर्व पर नाना प्रकार के गीत, भजन और सीठने  सुनाए जाते हैं। सांकेतिक भाषा में इनमें वह सब शामिल है। जो एक कुंवारी लड़की विवाह से पूर्व अपने सपनों में देखती है। इतना ही नहीं उसका ससुराल कैसा हो?

उसकी क्या-क्या इच्छाएं मनोकामनाएं और अभिलाषा होती है और तो और इसमें सभी रिश्ते नातों का संतुलित वर्णन मिलता है। सच तो यह है कि शादी से पूर्व हर लड़की के ससुराल को लेकर कुछ सपने होते हैं। सीठने एक ऐसी परंपरा है। जिसमें गणगौर पूजने वाली कुंवारी लड़कियां ईसर जी को अपना जीजा समझती हैं। जीजा से मजाक मजाक में बहुत कुछ कह डालती हैं। यह प्रतीक है। भक्त और भगवान के प्रेम का, जहां सभी दूरियां समाप्त हो जाती हैं। ठीक वैसे ही जैसे गोपियों और कृष्ण भगवान का।

 

कब आती है गणगौर?

16 दिन का गणगौर माता का पूजन होली के दूसरे दिन से शुरू होकर चैत्र शुक्ल तृतीया तक चलता है। यह पर्व संकेत है सौभाग्य, समानता, साथ और स्वतंत्रता का।

स्त्री के सोलह श्रृंगार सोलह दिन की गणगौर में विशेष महत्व रखते हैं।

 

एक मान्यता यह भी है

कामदेव की पत्नी रति ने भगवान शंकर की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न कर लिया। शिव के तीसरे नेत्र से भस्म हुए अपने पति को उन्हें जीवन देने की प्रार्थना की, प्रार्थना से प्रसन्न हो भगवान शिव ने कामदेव को जीवित दिया था। उसी स्मृति में गणगौर का उत्सव मनाया जाता है। इसमें अनेक रस्में तथा नेगचार भी शामिल है।

नवरात्रि में आने वाला गणगौर का पर्व ना सिर्फ राजस्थान में अपितु मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्य में भी मनाया जाता है। यही नहीं प्रवासी राजस्थानी भी इसे इसे बड़े धूमधाम से मनाते हैं। राजस्थानी परंपरा को संजोए यह लोकोत्सव अपने आप में पुरानी विरासत का खजाना संजोए है। गणगौर से जुड़ी अनेक रोचक, कथा, कहानियां और किस्से हमारे धार्मिक ग्रंथों साहित्य में मिलते हैं

 

विधि विधान

होलिका दहन की राख से 8 पिण्ड बनाए जाते हैं और 8 पिण्ड  गोबर के बनाए जाते हैं। इन्हें दूब पर रखकर पूजा की जाती है। काजल, रोली की बिंदिया लगाई जाती है। आठवें दिन शीतलाष्टमी को ईसर और गणगौर की मिट्टी की मूर्तियां बनाई जाती है। शिव पार्वती की इन मूर्तियों का सोलह श्रृंगार किया जाता है 16 दिन तक इनका गीत संगीत, भोजन, पानी का इंतजाम किया जाता है। गोरबंदोरा भी निकाला जाता है। बड़ी गणगौर अर्थात चैत्र शुक्ल तृतीया को विधि विधान से पूजा करके इन्हें विसर्जित कर दिया जाता है।

 

पूजन

गणगौर पूजन के लिए कुंवारी लड़कियां और सुहागिन स्त्रियां सुबह से सुंदर वस्त्रों आभूषणों को पहनना सिर पर लोटा लेकर आसपास के बाग बगीचे में जाती है। ताजा जल लोटे में भरकर उसमें हरी हरी दूब, फूल सजाकर गणगौर के गीत गाती हुई पूजा स्थल तक पहुंचती हैं। शिव और गौरी को संपूर्ण सुहाग की वस्तुएं अर्पित करके रोली, मोली, अक्षत, धूप, दीप, घास और नाना प्रकार के पुष्पों से सजाती है। गीत गाती है। पूजा-अर्चना करती है। यह क्रम पूरे 16 दिन सूर्य उदय होने से पहले संपन्न किया जाता है। जिसमें 16 दिन तक दीवार पर सोलह, सोलह बिंदिया रोली, काजल और मेहंदी की लगाई जाती है। दूब से पानी के 16 बार छीटें डाले जाते हैं। जो 16  श्रृंगार के प्रतीक माने जाते हैं।

यही नहीं गणगौर के पर्व में जो प्रसाद गुणे के रूप में चढ़ाया जाता है । वह आटे, बेसन या मैदा का बनता है। खासकर जिसे मीठा बनाया जाता है। मान्यता यह है कि यह भी पार्वती के श्रृंगार से जुड़ा है। जितने गुणे पार्वती जी को चढ़ाए जाते हैं। उतना ही धन और वैभव बढ़ता है। इसकी पूजा  के बाद महिलाएं अपनी सास, ननंद, जेठानी को प्रसाद, और दक्षिणा देकर आशीर्वाद लेती हैं।

नवरात्रि में आने वाले गणगौर पर्व से एक दिन पूर्व सिंधारे भी होते हैं। जो सूचक है लाड प्यार और अपनत्व का। जिसमें नवविवाहिता जो प्रथम बार गणगौर का पूजन कर रही है। उसके ससुराल से शगुन आता है। सोलह श्रृंगार के साज सामान के साथसाथ, नए गहने आभूषण सभी कुछ ससुराल की श्रद्धा अनुरूप अपनी बहू को भेट किया जाता है।

नवविवाहिता जो शादी के बाद प्रथम गणगौर अपने पीहर में आकर पूजती है। वहां 16 दिन का एक महापर्व बन जाता है। जिसमें नाना प्रकार के गीत संगीत, उत्सव होते हैं। आसपास की महिलाएं और लड़कियां भी उसी घर में गणगौर पूजन को जाती है जहां पर गणगौर बनाई जाती है।

गणगौर का यह पर्व राजस्थान में विविधताओं से परिपूर्ण है। जयपुर, जैसलमेर, बीकानेर, नाथद्वारा  शहरों की गणगौर ना सिर्फ भारत में बल्कि संपूर्ण विश्व मे प्रसिद्ध है। गणगौर की विशेषत महिलाओं का त्यौहार है। इस पर विदेशी पर्यटक भी खूब आते हैं। जयपुर की गुलाबी नगरी की गणगौर हो या जैसलमेर की अपने आप में अनूठी पहचान लिए हैं

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