Rare Disease Drugs: भारतीय वैज्ञानिकों ने बड़ी सफलता प्राप्त करते हुए 8 नई दवाईयों का निर्माण कर लिया है। बहुत ही दुर्लभ बीमारियों के इलाज में काम आने वाली इन दवाईयों की कीमत अंतरराष्ट्रीय मार्केट में करोड़ों रुपए हैं। जबकि भारत में बनी दवाईयों की कीमत सौ गुणा से भी कम होगी।
केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. मनसुख मंडाविया और नीति आयोग के सदस्य डॉ. वी. के. पॉल ने बतााय कि देश में छह अतिदुर्लभ बीमारियों की आठ दवाईयों (Rare Disease Drugs) को तैयार किया गया है। ये दवाएं महंगी दवाओं के समान ही असरकारक लेकिन उनसे बहुत ज्यादा सस्ती हैं।
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उन्होंने बताया कि चार दवाईयों को मार्केट में उतारा जा चुका है। बाकी चार दवाओं के लिए टेस्टिंग हो चुकी है और उन्हें सरकारी अनुमति मिलना बाकी है।
सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार इन रेयर बीमारियों में टायरोसिनेमिया (tyrosinemia), गौचर (gauchers), विल्सन (wilsons), ड्रेवेट सिंड्रोम (dravet), फेनिलकीटोनूरिया (phenylketonuria) और हाइपरअमोनमिया (hyperammonemia) शामिल हैं। फिलहाल इनकी दवाईयां कुछ गिनी-चुनी कंपनियां ही बनाती हैं जिनकी कीमत करोड़ों रुपए में हैं।
सरकार द्वारा विकसित की गई दवा इग्लूसेट की कीमत मार्केट में 3.6 करोड़ रुपए है लेकिन अब नई दवा आने के बाद इसका इलाज महज 3 से 6 लाख रुपए में हो सकेगी। इसी तरह स्किल सेल एनीमिया (sickle cell anemia) की बीमारी की दवा भी लगभग 70 हजार रुपए की आती है जो अब भारत में बनने के बाद मात्र 450 रुपए में उपलब्ध हो सकेगी।
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आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अभी देश में कई लाख मरीज दुर्लभ बीमारियों (Rare Disease Drugs) से ग्रस्त हैं। जबकि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब है। ऐसे में वे इलाज नहीं करवा पाते हैं। परन्तु अब सस्ती दवा आने से उन्हें काफी राहत मिलेगी।
फिलहाल सरकार ने जिन 4 दवाओं को मंजूरी दी है, उनके नाम निटिसिनोन (nitisinone), इग्लूसेट (eiglusat), ट्राइनटाइन (trientine) और कैनाबिडोल (cannabidol) है। जबकि सैबप्रॉपटेरिन (sabpropterin, सोडियम फेनिल बुटयेर (sodium pehnyl butyare), कैग्लूमिक (caglumic) और एसिड मिग्लुसेट (acid miglusat) को 2024 तक मार्केट में उतार दिया जाएगा। सरकार इन दवाओं को विदेशों में भी निर्यात करेगी।
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