Netaji Subhash Chandra Bose Mandir: नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारत के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं। ब्रिटिश काल में भारत को अंग्रेजों से आजादी दिलाने में उनके योगदान को नाकारा नहीं जा सकता है। प्रतिवर्ष 23 जनवरी को भारत में उनकी जन्मतिथि को 'पराक्रम दिवस' के तौर पर मनाया जाता है। इसी दिन से भारत में गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) की तैयारियां भी शुरू कर दी जाती है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस हर युवा के लिए प्रेरणास्रोत रहे हैं।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवनकाल से कई चीजें सीखी जा सकती है। उनके चाहने वाले और उनके आदर्शों को फॉलो करने वाले इस दुनिया में आज भी कई लोग हैं। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश के वाराणसी के लमही में नेताजी के चाहने वालों ने उनका एक मंदिर बनवा रखा है, जो आस्था का प्रतीक है।
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यह विश्व का इकलौता ऐसा मंदिर है, जहां भारत माता की प्रार्थना से कपाट खुलते है। साथ ही सुभाष आरती के बाद कपाट बंद होते हैं। मंदिरों की नगरी कहे जाने वाली काशी में Netaji Subhash Chandra Bose राष्ट्रदेवता के रूप में पूजे जाते हैं। दुनिया के 15 देशों के सुभाषवादियों की यहां आस्था हैं।
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सुभाष मंदिर का उद्देश्य क्रांति, शांति, शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करना हैं। सुभाष मंदिर 11 फीट ऊंचा है। मंदिर की सीढ़ियां लाल रंग (अर्थात क्रांति का रंग) की हैं। सीढ़ियों से चढ़कर आधार चबूतरा सफेद रंग (अर्थात् शांति का आधार) का है। मूर्ति काले रंग की है और छत्र स्वर्ण के रंग का है। मंदिर में नेताजी की प्रतिमा काले ग्रेनाइट से बनी हैं। काला रंग शक्ति का प्रतीक है और शक्ति की पूजा से सकारात्मक ऊर्जा (सुनहरा छत्र) निकलती है।
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