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चुनाव: इंदिरा से मोदी तक सियासी मोहरा बना गरीब? जानिए जनता के साथ कैसे हुआ खेला

जयपुर।       गरीब सियासी मोहरा ही बनकर रह गया। आंकड़ों की बाजीगरी में कभी गरीबी कम हो जाती है, तो कभी बढ़ जाती है। जानिए गरीबी मिटाने के दावों पर कितनी  खरी उतरी सरकारें … 

 

इंदिरा गांधी से लेकर नरेंद्र मोदी तक, 52 साल के इस सियासी सफर में भारत को 12 प्रधानमंत्री मिले लेकिन गरीबी और भूख का मुद्दा जस का तस है सभी प्रधानमंत्रियों ने गरीबी हटाने के पुरजोर दावे किए, लेकिन देश में गरीबी कितना हटी ये आंकड़ों तक ही सीमित है। विधानसभा चुनाव नजदीक है ऐसे में इस स्टोरी में जानेंगे तीन राज्य… राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में जहां कितने लोग गरीबी रेखा से भी नीचे हैं?  यहां विधानसभा चुनाव से पहले सभी पार्टियां रोजगार से लेकर गरीबी मिटाने के वादे कर रही है। गरीबी मिटाने के दावों पर कितनी  खरी उतरी सरकारें ! इन आंकड़ों से समझा जा सकता है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़, इन तीनों राज्यों में इस साल के अंत तक विधानसभा चुनाव को लेकर  सभी पार्टियां सियासी रण में उतर चुकी है। चुनावी वादें,और लोक लुभावन घोषणा करने में  कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियां आगे हैं। गरीबी, बेरोजगारी और शिक्षा ये तीनों ही मुद्दे चुनाव प्रचार में अहम होते है  चुनाव प्रचार के दौरान इन तीनों ही राज्यों में गरीबी का मुद्दा काफी उठाया भी गया। सभी पार्टियों ने  रोजगार से लेकर बेरोजगारों को पैसे देने तक तमान वादे किए है। लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या वाकई ये पार्टियां इन तीनों राज्यों में गरीबी मिटाने में कामयाब हो पाएंगीं। जानते हैं कि आखिर राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़, में चुनाव से पहले कितने लोग गरीबी रेखा से भी नीचे है? 

 

गरीब कौन हैं?
बुनियादी जरूरतों को अपनी कमाई से पूरा नहीं कर पाने वाले लोग या समूह गरीबी रेखा के नीचे आते हैं। इसको लेकर दुनियाभर के अलग-अलग देशों में अलग-अलग मापदंड तैयार किए गए हैं। विश्व बैंक के मुताबिक रोजाना करीब 130 रुपए नहीं कमाने वाले लोग गरीबी रेखा के नीचे आते हैं। 

 

अब गरीबी का आंकड़ा क्या है?
साल 2020 में संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था यूएनडीपी ने एक रिपोर्ट जारी की थी।  रिपोर्ट के मुताबिक भारत की कुल 135 करोड़ आबादी में से 22 करोड़ लोग अब भी गरीबी रेखा के नीचे हैं।  दुनिया में गरीबों की संख्या मामले में भारत का स्थान सबसे ऊपर है।  हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में पिछले 20 साल में 40 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकले।  

 

लेकिन कोरोना काल के बाद 2022 में आई ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) की सूची ने फिर से सरकार की टेंशन बढ़ा दी।  भुखमरी मामले में भारत का स्थान 121 देशों में 107वें नंबर पर था।  रिपोर्ट में कहा गया कि कोरोना के बाद 5 करोड़ 60 लाख भारतीय फिर से गरीबी रेखा ने नीचे आ गए।  

 

साल 2023 में लोकसभा में दिए गए एक सवाल के जवाब में कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय ने बताया कि राजस्थान में कुल मिलाकर 1.02 करोड़ लोग यानी कुल जनसंख्या का 14.7%  आबादी गरीबी रेखा से नीचे हैं. हालांकि साल 2015-16 में हुए एक नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे के अनुसार राजस्थान में 28.86 प्रतिशत लोग गरीब थे।  

 

 एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य में गरीबी का आलम ये है कि विकास के तमाम दावों के बाद भी राजस्थान में लगभग 60 प्रतिशत आबादी बिना गैस सिलेंडर के चूल्हे पर रोटियां बना रही है।  हालांकि नीति आयोग की एक रिपोर्ट को अनुसार गहलोत सरकार के इस कार्यकाल में यानी इन चार साल में 1 करोड़ 8 लाख 16 हजार 230 लोग गरीबी से बाहर आए हैं। ये पूरे देश में यूपी, बिहार और एमपी के बाद सर्वाधिक है। 

 

इन मामलों में पिछड़े

एक रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान में अब भी 34.09% ऐसे लोग हैं जिनका परिवार पूर्ण रूप से पोषित नहीं है। इसके अलावा लगभग 29 प्रतिशत से ज्यादा परिवार ऐसे हैं जिनके घरों में  शौचालय नहीं है। इस राज्य में लगभग 10 प्रतिशत से ज्यादा लोगों को पीने के लिए साफ पानी नहीं मिल रहा है। इसके अलावा राजस्थान में लगभग 45 प्रतिशत से ज्यादा लोगों के पास पक्के मकान नहीं हैं। जबकि 10 प्रतिशत से ज्यादा लोग ऐसे हैं जिनके पास संपत्ति के नाम पर कुछ नहीं हैं।

 

5 साल में घटे 1 करोड़ गरीब

गहलोत सरकार के पिछले कार्यकाल में इस राज्य में  में 1 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी से बाहर आ गए। राज्य में साल 2015 से 16 में 28.68 प्रतिशत लोग गरीब थे, जबकि 2019-21 के सर्वे में 14.7 प्रतिशत लोग गरीब रहे।

 

मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश नीति आयोग अगस्त की शुरुआत में बहुआयामी गरीबी पर अपनी रिपोर्ट पेश की थी।  इस रिपोर्ट के अनुसार इस राज्य में गरीबी में 15.94 प्रतिशत कमी आई है. यानी लगभग 1.36 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आए हैं।बता दें कि मध्य प्रदेश की ग्रामीण क्षेत्र में गरीबों की आबादी में 20.58 प्रतिशत की कमी आई है। साल 2015-16 की एनएफएचएस 4 रिपोर्ट में यह संख्या 45.9% थी, जो की साल 2019-21 के एनएफएचएस-5 में कम होकर 25.32% तक आ गई थी।  इस राज्य के शहरी क्षेत्रों की बात करें तो मध्य प्रदेश के शहरी इलाकों के गरीब  आबादी में 6.62% की गिरावट आई है. साल 2015-15 में आए एनएफएचएस 4 की रिपोर्ट में यह 13.72 प्रतिशत थी जो साल 2019-21 की रिपोर्ट में कम होकर 7.1% तक आ गई है।

 

छत्तीसगढ़

नीति आयोग ने "राष्ट्रीय बहुआयानी गरीबी सूचकांक प्रगति समीक्षा 2023" रिपोर्ट जारी की है जिसमें दावा किया गया है कि भारत में बड़ी संख्या में लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आ गए हैं।

छत्तीसगढ़ की बात करें तो यहां पर फिलहाल भूपेश बघेल की सरकार है।  इस राज्य में कुछ महीनों में पांच साल का कार्यकाल खत्म हो जाएगा और विधानसभा चुनाव होगें। हालांकि छत्तीसगढ़ में बहुआयामी गरीबी से लोग बाहर आ रहे हैं।  रिपोर्ट के अनुसार राज्य में पिछले 5 सालों में 40 लाख लोगों ने अपने जीवन में परिवर्तन पाया है और बहुआयामी गरीबी से बाहर आ गए हैं।  मिली जानकारी के मुताबिक शहरों की तुलना में गांवों में गरीबों की संख्या में तेजी से कमी आई है। 

इस राज्य में साल 2015-16 और साल 2019-21 के बीच 13.53 प्रतिशत लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर निकले हैं। साल 2015-16 में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले की आबादी 29.90 प्रतिशत थी. जो कि साल 2019-20 में घटकर 19.37 फीसदी रह गई है। 

 

कैसे मापी जाती है गरीबी रेखा

वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम ने गरीबी का 4 पैमाना बताया है, जिसे पूरा नहीं कर पाने वाले लोगों को गरीब माना गया है. 
1. गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की उपलब्धता
2. टेक्नोलॉजी तक पहुंच
3. काम के अवसर, सैलरी और काम का ढंग
4. सामाजिक सुरक्षा

भारत में साल 2014 तक गरीबी रेखा का निर्धारण ग्रामीण इलाकों में 32 रुपए प्रतिदिन और कस्बों तथा शहरी इलाकों में 47 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से निर्धारित की गई थी।  लेकिन साल 2017 में गरीबी दूर करने के लिए नीति आयोग ने एक विज़न डॉक्यूमेंट प्रस्तावित किया था।  जिसमें साल 2032 तक भारत में गरीबी दूर करने की योजना तय की गई थी।  

 

Suraksha Rajora

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