तमिलनाडु और महाराष्ट्र में जल्लीकट्टू, कंबाला और बैलगाड़ी दौड़ की अनुमति देने वाले कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर आज सुप्रीम कोर्ट फैसला सुनाया गया। सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बैंच ने 8 दिसंबर 2022 को मामले की सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा लिया था। 5 महीने बाद आज इसका फैसला सबको सुनाया। कोर्ट ने कहा कि जल्लीकट्टू का परंपरागत खेल जारी रहेगा।
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बुल फाइटिंग सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा
जल्लीकट्टू यानि सांड-बैलों की दौड़ की परमिशन देने वाले कानूनों की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस केएम जोसेफ, अजय रस्तोगी, अनिरुद्ध बोस, ऋषिकेश रॉय और सीटी रविकुमार की बैंच ने यह फैसला सुनाया। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के जल्लीकट्टू खेल में जानवरों के इस्तेमाल होने के सवाल पर तमिलनाडु सरकार ने कहा कि बैलों के साथ कोई भी क्रूरता नहीं होती। जल्लीकट्टू केवल मनोरंजन का काम नहीं सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। इसके अलावा तमिलनाडु सरकार ने यह भी तर्क दिया था कि खेल में इस्तेमाल करने वाले सांडों को पहले किसानों द्वारा प्रशिक्षण दिया जाता है जिससे कोई खतरा नहीं हो।
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क्या है जल्लीकट्टू
जल्लीकट्टू यानि सांड-बैलों की दौड़। यह खेल पोंगल त्योहार का हिस्सा है। इस खेल में भीड़ के बीच एक सांड को खुला छोड़ दिया जाता है। खिलाड़ियों को उस खुले सांड को कंट्रोल करना होता है। 2014 में केंद्र सरकार ने इस खेल पर रोक लगा दी थी। क्योंकि 2011 में बैलों को उन जानवरों की लिस्ट में शामिल किया गया जिनके प्रदर्शन पर बैन है। 2016 में फिर से केंद्र सरकार ने इसे हरी झंडी दे दी। खेल के आयोजन को लेकर बनाए गए कानून को रद्द करने के लिए पेटा फिर से सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। एक बार याचिका खारिज करने के बाद सुप्रीम कोर्ट फिर से सुनवाई के लिए तैयार हुआ। 8 दिसंबर 2022 को मामले की सुनवाई पूरी हुई।
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