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Hanuman Beniwal News : जयपुर। राजस्थान में 7 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो रहे है, सभी प्रत्याशियों की किस्मत मत पेटी में बंद हो चुकी है। जिसमें कई नेताओं की किस्मत भी दांव पर लगी है। जिसमें खींवसर से हनुमान बेनीवाल भी शामिल है, हनुमान बेनीवाल की पत्नी यदि चुनाव हार गई तो, राजस्थान में आरएलपी के भविष्य पर सवालियां निशान लग सकता है, क्योंकि इस चुनाव के नतीजे, केवल राजनीतिक दलों के लिए नहीं, बल्कि पूरे राजस्थान की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं, आइए जानते है क्या है पूरा मामला?
दरअसल राजस्थान की 7 सीटों पर हो रहे विधानसभा उपचुनाव के नतीजे, सिर्फ राजनीतिक दलों की नहीं, बल्कि पूरे राजस्थान की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं। चुनाव प्रचार में इस बार बीजेपी, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। लेकिन सबकी नजरें इस बार जाट समाज के वोट बैंक पर है। वहीं अगर आरएलपी की बात करें तो इस बार हनुमान बेनीवाल के सामने इस चुनाव में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनकी पत्नी, कनिका बेनीवाल, खींवसर सीट पर उम्मीदवार हैं। और इस बार उनका मुकाबला केवल बीजेपी और कांग्रेस से नहीं, बल्कि उनके पुराने साथी रेवंत राम डांगा से भी है। जिनका बीजेपी के टिकट पर मैदान में उतरना, बेनीवाल के लिए चिंता का कारण बन गया है। ऐसे में अगर कनिका बेनीवाल यह चुनाव हार गई तो आरएलपी का एक भी सदस्य विधानसभा में नहीं होगा और लोग कहेंगे आरएलपी साफ हो गई।
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हनुमान बेनीवाल ने यह बात चुनाव प्रचार के दौरान कही थी। उनका कहना था कि खींवसर जीतने से ही उनकी पार्टी का भविष्य सुरक्षित रहेगा। लेकिन रेवंत राम डांगा, जिन्होंने पहले आरएलपी में रहकर बेनीवाल के साथ काम किया था, अब बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। डांगा ने 2023 विधानसभा चुनाव में बेनीवाल को कड़ी टक्कर दी थी, और इस बार उनका इरादा कनिका बेनीवाल को हराकर खींवसर से सदन में पहुंचने का है। यह तो सच है कि रेवंत राम डांगा ने बेनीवाल को 2018 विधानसभा चुनाव में कड़ी टक्कर दी थी। हालांकि, बेनीवाल जीत तो गए, लेकिन अंतर महज 2059 वोटों का था। अब डांगा इस बार कनिका बेनीवाल को हराकर विधानसभा पहुंचने का सपना देख रहे हैं। खींवसर की यह सीट सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि यह एक राजनीतिक गढ़ बन चुकी है। हनुमान बेनीवाल का परिवार 47 सालों से इस क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। उनका परिवार एक राजनीतिक धारा का हिस्सा है, जो खींवसर से शुरू होकर नागौर तक फैला हुआ है।
हनुमान बेनीवाल की राजनीतिक पारी की बात करे तो, हनुमान बेनीवाल के पिता, रामदेव बेनीवाल, दो बार विधायक रहे हैं। 1977 में रामदेव बेनीवाल ने कांग्रेस के टिकट पर मुंडावा सीट से विधानसभा चुनाव जीता था, और 1985 में लोकदल से भी वे विधायक बने थे। 2008 में परिसीमन के बाद इस सीट का नाम खींवसर रख दिया गया। उसी समय, हनुमान बेनीवाल ने भारतीय जनता पार्टी के चुनाव चिह्न पर खींवसर से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। लेकिन इस बार चुनावी माहौल थोड़ा अलग है। जाट समाज की मजबूत उपस्थिति और रेवंत राम डांगा के बीजेपी में शामिल होने से खींवसर विधानसभा उपचुनाव एक त्रिकोणीय मुकाबला बन गया है।”
“खींवसर का उपचुनाव सिर्फ स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। यह जाट समाज के वोटों का सबसे बड़ा संघर्ष बन चुका है। बेनीवाल परिवार के लिए यह एक प्रतिष्ठा की लड़ाई है, जबकि बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही खींवसर में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।” खींवसर का उपचुनाव न केवल हनुमान बेनीवाल की प्रतिष्ठा के लिए अहम है, बल्कि आरएलपी पार्टी के भविष्य के लिए भी यह चुनाव एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। अगर इस चुनाव में आरएलपी हार जाती है, तो यह पार्टी की राजस्थान विधानसभा में एकमात्र सीट को खोने का खतरा पैदा कर सकता है।
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