जयपुर। राजस्थान में कांग्रेस का चुनावी फॉर्मूला आउट हो गया है। इसमें वो सभी बातें हैं जिनके तहत एकबार फिर से पार्टी राज्य में अपनी सरकार बनाने को लेकर अग्रसर है। आपको बता दें कि यदि यह फॉर्मूला लागू हो गया तो फिर प्रदेश के शीर्ष नेता अपने चहेतों को टिकट दिलाने के लिए जोर आजमाइश नहीं कर पाएंगे। दरअसल कर्नाटक फॉर्मूले के तहत स्टेट लीडरशिप की बजाए केंद्रीय नेतृत्व की मर्जी से ही टिकट तय होंगे। पार्टी हाईकमान की इस मामले में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा से भी चर्चा हो चुकी है।
लीडरशिप को किया किनारे
कर्नाटक फॉर्मूले के तहत प्रत्याशी चयन में प्रदेश के शीर्ष नेताओं से केवल राय ही ली जाएगी। प्रत्याशी का फैसला शीर्ष नेतृत्व करेगा। जानकारों का कहना है कि प्रत्याशी चयन के लिए होने वाली स्क्रीनिंग कमेटी की बैठकों में भी स्टेट लीडरशिप अपने-अपने समर्थकों के लिए ज्यादा प्रयास नहीं कर पाएंगे।
ऐसे तय होंगे टिकट
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि प्रत्याशी चयन में इस बार नेताओं की सिफारिश नहीं बल्कि सर्वे रिपोर्ट प्रमुख आधार होगी। अगर सर्वे में मौजूदा विधायकों की ग्राउंड रिपोर्ट सही नहीं है तो उन विधायकों का टिकट काटकर सर्वे में सामने आए मजबूत चेहरे को टिकट दिया जाएगा। एआईसीसी की ओर से लगातार विधायकों और जिताऊ चेहरों को लेकर सर्वे करवाया जा रहा है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश प्रभारी रंधावा भी कई बार कह चुके हैं कि इस बार सर्वे रिपोर्ट के आधार पर टिकट तय होगा।
प्लान के लागू होने पर उठ रहे सवाल
राजस्थान में टिकट वितरण को लेकर कर्नाटक फॉर्मूला सख्ती से लागू होगा या नहीं इसे लेकर कांग्रेस गलियारों में चर्चाएं हैं। दरअसल उदयपुर में हुए पार्टी के नव संकल्प शिविर में लिए गए फैसले भी सख्ती के साथ लागू नहीं हो पाए। परिवार में एक टिकट, एक व्यक्ति एक पद सिद्धांत, महिलाओं को 33 फीसदी टिकट जैसे नियम बनाए गए थे लेकिन कर्नाटक में ही इन फॉर्मूलों को सख्ती से लागू नहीं किया गया।
ये पहले के चुनावों का गणित
आधा दर्जन नेताओं के साथ ही उनके पुत्र-पुत्रियों को भी टिकट दिया गया था। वहीं महिला प्रतिनिधित्व के तौर पर 224 सीटों में से केवल 11 टिकट महिलाओं को दिए गए थे। वहीं, डीके शिवकुमार पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष भी हैं और डिप्टी सीएम भी हैं।
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