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मोती डूंगरी पर ही क्यों बनाया गया गणेश मंदिर, जानिए सेठ जय राम पल्लीवाल, मूर्ति और बैलगाड़ी का अनोखा कनेक्शन

जयपुर। जयपुर को धार्मीक स्थल होने के कारण छोटी काशी के नाम से भी जाना जाता है। देश भर में ऐसे तो हजारों मंदिर है मगर जब बात सबसे प्रसिद्ध मंदिरों की होती है। तो इसमें मोती डूंगरी गणेश मंदिर का नाम भी लिया जाता है। मोती डूंगर गणेश मंदिर का इतिहास लगभग 400 साल पुराना है। इस मंदिर को निर्माण 1761 में सेठ जय राम पल्लीवाल की निगरानी में करवाया गया था। इसकी मंदिर की वास्तुकला भक्तों को अपनी और आकर्षित करती है। मोती डूंगरी मंदिर की कहानी बेहद रोचक है।

 

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जहां बैलगाड़ी रूकी वहीं गणेश जी का मंदिर बना

कहा जाता है की एक बार राजा गणेश बैलगाड़ी से मूर्ति के साथ यात्रा से लौट रहे थे। यात्रा के दौरान शर्त रखी गई जहां बैलगाड़ी रूकी वहीं गणेश जी का मंदिर बना दिया जाएगा। बैल गाड़ी चलने लगी और डुंगरी पहाड़ी के नीचे आते ही बैलगाड़ी रूक गई। जैसे ही बैलगाड़ी रूकी उसी समय सेठ जय रसाम ने मंदिर बनाने का निर्णय कर लिया।

 

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गुजरात से लाई गई है मुर्ती

गणेश चतुर्थी के मौके पर यहा भक्तों की भीड़ लगती है। यहा जयपुर ही नहीं बल्की देश भर से भक्तों का तांता लगता है। कहते यहा विराजित मुर्ती गुजरात से लाई गई है। जब यह प्रतिमा लाई गई तब यह पांच सौ वर्ष पुरानी प्रतिमा थी। गणेश मंदिर के दक्षिण में एक टीले पर लक्ष्मीनारायण का भव्य मंदिर है। मोती डूंगरी गणेश मंदिर मे भक्तों का तांता लगा रहता है। मंदिर मे सुबह 5 बजे से लेकरस दोपहर 1:30 बजे तक दर्शन किए जा सकते है। मंदिर में हर बुधवार को नए वाहनों की पूजा करवाने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। यहा दाहिनी सूंड वाले गणेशजी की प्रतिमा विराजित है। जिस पर सिंदूर का चोला चढ़ाकर भव्य श्रंगार किया जाता है।

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