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.. मैं 297 साल का जवां जयपुर हूं

 

मैं जयपुर हूं। आप जानते हैं कि मेरे पिता सवाई जयसिंह हैं। 295 साल पहले मेरा जन्म हुआ। खूबसूरती, बनावट औऱ नगर नियोजन के कारण दुनिया में मेरी अलग पहचान है। मुझे ना कोई तूफान हिला सका ना ही मानवजनित दंगा। मैं कल भी अटल था औऱ कल भी अटल रहूंगा। मेरी हस्ती मिटाने की 295 साल में भी कोई हिम्मत ना कर सका। जब जब मुझसे छेड़छाड़ करने का प्रयास किया, उसे उसका फल भुगतना पड़ा। मुझ पर जब भी आपदा आई, मेरी हस्ती का मिटा नहीं सकी औऱ मैं फिर खड़ा हो गया। चार दशक पहले की बाढ़ हो या सीरियल बम बलास्ट। राम जन्म भूमि आंदोलन के दंगे हो या फिर छात्र आंदोलन। 

 

सबको देखा है मैंने। मेरा निर्माण वास्तु औऱ ज्योतिष के आधार पर हुआ है, यही वजह है कि मेरे शहर में रहने वाले तमाम धर्मों के लोगों ने सदा विकास किया है, बदले में मैैंने खुशहाली दी है। इस शहर में कोई गुम नहीं हो सकता है। कहीं से भी चले जाए औऱ घूमकर मुख्य सड़क पर आ जाएगा। मेरी रक्षा करने के लिए चारों कोनों पर साक्षात भगवान बिराजमान हैं। पूर्व में भगवान नृसिंह बिराजमान हैं तो पश्चिम में चांदपोल के परकोटे में बजरंग बली। शिला माता का डंका बजता है। पहाडी की ऊंचाई पर पूरब दिशा में सूरज मंदिर है। छोटी काशी के रूप में भी मेरी पहचान है। हर गली में मंदिर औऱ हर दिन त्यौहार है। आराध्य देव गोविंद देव जी हैं। कटोरेनुमा आकृति के कारण कभी पानी नहीं भरता है। एक दौर था जब कचरा उठाने के लिए भी रेल चला करती थी।

 

295 साल पहले जिस परिकल्पना के साथ शहर को बसाया गया वो आज भी लाखों लोगोंं की आबादी के वजन को मुस्कुराता हुआ उठा रहा है। चारदीवारी के बाजारों के बरामदे, बाजारों में एक रूपता, समूचे बाजार व घर गुलाबी देखते ही बनते हैं। हवामहल हो या जंतंर मंतर, नाहरगढ़ व जयगढ़ का किला हो या आमेर, अल्बर्ट हाल हो या सिटी पैलेस। गढ़ गणेश हो या मोतीडूंगरी गणेश मंदिर। 

 

एम आई रोड पर गुलाब जी चाय वाले हों या चौड़ा रास्ता के साहू जी चाय वाले। हल्दियों के रास्ते के कचौरी समासे हों या सांभर की फीणी। नारायण जी की गजक हो या एलएमबी के घेवर। कलजुगी हलवाई के टिपोरे हो या सौंधिया का मूंगथाल। सब दुनिया भर में मशहूर हैं। कारोबार के हिसाब से शहर की बसावट की गई। चूड़ी वालों का मौहल्ला, मसाले वालों की गली, बाण वालों का रास्ता ठठेरों का चौक, बिसायतियों का मौहल्ला आदि-आदि। हिन्दू हो या मुसलमान हर मजहब का इंसान मिलजुलकर रहता है। ईद हो या दीवाली मिलकर मनाई जाती है। 

 

वक्त के साथ शहर ने करवटें बदली। समय के साथ खुद को बदला। तभी तो दुनिया मेरी ताऱीफ करती है। भूमिगत औऱ जमीन से ऊपर मेट्रो रेल चलने लगी। एलिवेटेड रोड, फ्लाई ओवर, अंडरग्राउंड पुल, तीन माले की सड़कें। सब कुछ है। परन्तु मेरी मूल स्वरूप से छेड़छाड़ करने की किसी की हिम्मत नहीं हुई। छोटी चौपड़ के रोजगारेश्वर मंदिर को तोड़ दिया गया तो सरकार ही चले गई। दोबारा मंदिर को उसी जगह बनाना पड़ा। 

 

लाख की चूडियां, जूतियां, बंधेज औऱ लहरिया की साडि़यां, हैंडिक्राफ्टस के सामान दुनिया भर में मशहूर हैं। ज्वैलरी की अपनी पहचान है। क्या क्या नहींं है। खान पान से लेकर पहनावे तक, आवभगत से लेकर मेजबानी तक। हर किसी की इच्छा रहती है जो जयपुर एक बार आ गया, उसका लौटकर जाने का मन नहीं हुआ। यही कारण है कि साल में पांच महीने तक लाखों ट्रूरिस्ट यहां की रोज सैर करता है। 

 

डा. उरुक्रम शर्मा

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