डॉ उरुक्रम शर्मा
भाई, क्या कर रहा है आजकल। क्या करूं यार, ट्रांसफर नहीं हो रहा, सारी सिफारिश लगा ली। चिंता क्यों करता है, दलालों की बड़ी फौज है। हर दरवाजे पर खड़े हैं। तू कुछ मत करना, बस काम बता देना। हाथों हाथ तुझे रेट बता देंगे। जगह के हिसाब से दाम फिक्स हैं। दाम दे तो मनचाहा काम करा ले। दाम देगा तो जमकर मलाई कूटना। किसी का बाप तेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। दाम देकर ट्रांसफर करवाया है तो निश्चित समय तक तुझे कोई हिला नहीं पाएगा। इसकी गारंटी दी जाती है।
बस, दाम पहले देने होंगे। हां, दाम पहले लिए जाते हैं। दलाल ईमानदार बहुत होते हैं। मेरी बात 100 टका खरी है। मुखिया तो खुद कह चुके हैं किसी ने पैसा देकर ट्रांसफर करवाया तो उसकी। खैर नहीं। किसी को पैसे देने की जरूरत नहीं। ये तो लीपापोती की बातें है, जब मुखिया को ये पता है कि ट्रांसफर एक इंडस्ट्री बन चुका, सत्ताधारी पार्टी के लोग दलाली कर रहे हैं तो उन्हें कैसे रोका जा सकता है। मजेदार बात ये है कि मंत्री के घरवाले से लेकर दूर तक के रिश्तेदार इस इंडस्ट्री को चला रहे हैं। मंत्री उनके घर का, अफसर की मना करने की हिम्मत नही, लक्ष्य जमकर वसूली। बोल भाई बोल, अब राजनीति कैसे नही रास आएगी। यूथ भी इस कदर राजनीति का दीवाना है उसे पता है डॉक्टर इंजीनियर बनने से कोई फायदा नही, बरसों तक पढ़ो , फिर भी रोजगार की गारंटी नही। राजनीति में दलाल बन जाओ, ना पढ़ने लिखने की जरूरत ना रोजगार की टेंशन।
मंत्री, विधायक का आशीर्वाद मिल गया तो बल्ले बल्ले। खूब जमीनों पर कब्जा करो, जमीन खाली करने के ठेके लो, किरायदारों को बेघर करो। डराओ, धमकाओ , फिर भी ना माने तो तमंचा निकाल लो। बिना मेहनत के मोटा दाम जेब में। हराम की कमाई से महंगी गाड़ियों में घूमों। थोड़े बहुत भाड़े के लोगों को पाल लो, जो सदा आपके साथ रहे। आपकी जय जयकार करें। लोगों को जाल में फंसाए और फिर जमकर लूटपाल का खेल करें।
हो, ये ही तो रहा है। रोज ट्रांसफर को लेकर हंगामा होता है। जिसकी सिफारिश और दाम नहीं, वो दूर दराज में।परिवार से दूर पड़ा रहता है। को दाम दे देता है वो खूब मलाई खाता है। इसमें स्त्री और पुरुष अफसर में कोई भेद नहीं। छोटे और बड़े अफसर की बात नहीं। हर कोई इंसान को मुर्गे की तरह काट रहा है। जब कोई इन सरकारी भ्रष्ट तंत्र से दुखी हो जाता है तो आत्महत्या कर लेता है, लेकिन इन संवेदनशील अफसरों पर कोई फर्क नही पड़ता है।
ये निष्ठुर, कठोर, निर्दयी और निर्मम हैं। इन्हें सिर्फ हराम की कमाई से मतलब होता है, आंसुओं से नही।
जयपुर का देखिए, रामप्रसाद हेरिटेज निगम के अफसरों की मिलीभगत और नेताओं से तंग आकर आत्महत्या करता है। वो छोटे सा अपना घर बनाना चाहता था ताकि पत्नी बच्चों के साथ रह सके। जमीन उसकी खुद के लेकिन निगम के चोरों ने ऐसा नहीं होने दिया, सिर्फ पास बन रही एक अवैध होटल के चक्कर में। इस होटल में सत्ता के दलालों का खेल है। बेचारा मार गया। उसके बाद भ्रष्ट अफसरों ने उसे मकान बनाने की इजाजत दी। इन दो कौड़ी के अफसरों से पूछो, रामप्रसाद क्या मरने के बाद उसमें रहने आएगा। क्या मुर्दे घरों में रहते है। सरकार के भी फर्क नहीं पड़ रहा अभी तक किसी भी जिम्मेदार अफसर के खिलाफ कोई एक्शन नही लिया। रामप्रसाद ने मरने से पहले एक वीडियो में सबके नाम लिए, कानून के अनुसार मरने से पहले दिए बयान बतौर सबूत होते हैं। भाई सरकार है, जिसके लोगों के कारण रामप्रसाद को दुनिया छोड़नी पड़ी, न्याय की उम्मीद मत करो रामप्रसाद।
ऐसे ही संजय पांडे सत्ताधारी पार्टी के एक एमएलए से तंग आकर खुदकुशी करता है, सरकार है, तो उसे भी इंसाफ नहीं मिलेगा।
भाई, अब तो तेरे सारी कहानी समझ आ गई होगी। भूल जा ईमानदार बनना, ईमानदार होना गुनाह है। दलाल बन दलाल। सरकारी महकमे में है तो जमकर माल समेत, पकड़ा जाए कभी तो ले देकर मामला रफा दफा करवा लेना, वरना गवाहों को सेट कर लेना। अब देख, जयपुर बम ब्लास्ट के चार आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई, उसके बाद जांच में सरकारी तंत्र ने ऐसी खामियां छोड़ी, चारों बरी होगे। तेरे को पता है ना, इस ब्लास्ट में 71 लोग मरे थे, 186 से ज्यादा घायल हुए थे, जिनके घाव आज तक हरे हैं। तो समझ, क्या करना है। मत सिखा किसी को, मत दे ज्ञान किसी को। जो चल रहा है, वैसा ही ढल जा तब तो मौज है, वरना ये धरती नरक है नरक।
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