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मंगल भवन अमंगल हारी, द्रबहु सुदसरथ अचर बिहारी…

एकता शर्मा।

क्या हर बार विकल्पों की उपस्थिति शुभ होती है? पाश्चात्य दर्शन ने विकल्पों पर विचार कर उन पर  अत्यधिक बल दिया। क्या विकल्प का भी नकारात्मक पक्ष होता है? शायद हां , यह अक्सर रिश्तो में दिखाई देता है। पति पत्नी के रिश्ते में राम सीता की जोड़ी बनी रहे। ऐसा आशीर्वाद अक्सर हमारे बड़े बुजुर्ग नव दंपति को देते थे और देते हैं। किंतु धीरे-धीरे यही राम सीता की जोड़ी टूटती सी नजर आ रही है। ऐसा क्यों? इसके पीछे अनेक कारण हो सकते हैं? किंतु सबसे बड़ा कारण है। स्त्री पुरुष दोनों में से किसी एक का अपने जीवनसाथी के प्रति वफादारी ना दिखाना। वह अधिकांशतः विकल्पों की तलाश करता रहता है। श्री राम जो मानव से महामानव ,महापुरुष बने। वह क्यों मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए ? राम के पास क्या विकल्प नहीं था जब उन्हें वनवास भेजा गया जब सीता हर ली गई जब सूर्पनखा ने प्रेम प्रस्ताव रखा जब लक्ष्मण मूर्छित हुए, अनेक ऐसे अवसर आए जब पग पग पर विकल्पों में से उन्हें चुनाव करना पड़ा यही चुनाव उन्हें मानव से महामानव की श्रेणी में रखता है। एक राजा होकर भी वह चाहते तो अनेक रानी रख सकते थे। उनके पिता ने भी तीन रानी बनाई थी। किंतु उन्होंने स्वयं के मन और इंद्रियों पर लगाम लगाई। वह एक सच्चे पत्नी व्रता पति बने ,पत्नी व्रता पति की पहली शर्त पत्निव्रता धर्म का पालन करना है। पुरुष कम धैर्यवान होता है। किंतु राम धैर्य का पर्याय हैं। इसी प्रकार एक बार जो उन्होंने सीता का हाथ थामा तो कभी नहीं छोड़ा । राम चाहते तो सूर्पनखा से जंगल में शादी कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। 

अरण्यकांड में सूर्पनखा कहती है।
"रुचिर रुप धरि प्रभु पहि जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह संजोग विधि रचा बिचारी।" 

सूर्पनखा कहती है विधाता का यह कितना अद्भुत संयोग है कि ना तो तुम्हारे समान कोई पुरुष है न हीं मेरे समान कोई स्त्री। हम दोनों को बहुत विचार कर रचा है। यह सुनकर भी राम ना तो प्रसन्न होते हैं और ना ही मर्यादा का संतुलन खोते हैं। यह परिचायक है। उनके मर्यादित आचरण का। जंगल जिसमें कितने मंगल, अमंगल होते हैं? किसी को कुछ पता नहीं । लेकिन उन्होंने कभी अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। मंगल भवन अमंगल हारी  ने कभी भी किसी के अमंगल की नहीं सोची। राम ने हमेशा अपनी पत्नी का सम्मान किया। क्योंकि वह अपनी मां का भी सम्मान करते थे। जो पुरुष अपनी मां का सम्मान करता है। वही अपनी पत्नी का भी सम्मान करता है। स्त्री किस को आकर्षित नहीं करती ?इससे तो देवता और ऋषि मुनि भी नहीं बच पाए। ऐसे में राम के नैतिक मूल्य आज के युवाओं के लिए आदर्श है। 

हम कब अच्छे हैं?

सामने मिष्ठान पड़ा हो, उसके बाद अगर कोई उस मिष्ठान को ना खाए तब वह संत कहलाता है। कोई देख रहा है या नहीं देख रहा है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता 
कर्तव्य को सर्वोपरि रखते हुए। उन्होंने संकट में भी संघर्ष का रास्ता चुनते हुए धैर्य धारण किया। पुरुष का पुरुषार्थ राम है तो स्त्री का पुरुषार्थ भी  राम ही है। यह सिर्फ पुरुष के लिए ही नहीं, स्त्री के लिए भी बराबर लागू होता है। स्वयं के पुरुष को जगाए। किंतु मर्यादा में रहकर। स्वतंत्रता को स्वच्छंदता में ना बदलना ही राम हो जाना है। अहंकार, राग द्वेष के समय राम के चरित्र को याद करें। इसी आधार पर निर्णय लेना ही अपने ईश्वर को सही सम्मान देना है।

ऐसे श्री राम जब प्रकट होते हैं तब क्या होता है अवधपुरी में?
भए प्रगट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी। हर्षित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी।।

दिनों पर दया करने वाली कौशल्या के हितकारी कृपालु प्रभु प्रगट हुए मुनियों के मन को हरने वाले उनके अद्भुत रूप का विचार करके माता हर्ष से भर जाती है। मित्रों को आनंद देने वाला मेघ के समान श्याम शरीर था ।चारों भुजाओं में अपने खास आयुध धारण किए हुए, आभूषण व माला पहने बड़े-बड़े नेत्र  इस प्रकार शोभा के समुंद्र तथा खर राक्षस को मारने वाले भगवान प्रकट हुए हैं। उक्त पंक्तियां तुलसीदास जी की रामचरितमानस  बालकांड से उदित है। बालकांड में ही भगवान श्री राम के जन्म उत्सव की अद्भुत लीला का वर्णन है। किस प्रकार पूरी अवधपुरी में साज सज्जा, रौनक और दीपोत्सव होता है। वह अद्भुत, अकल्पनीय है। राम के जन्म से पूर्व भविष्यवाणी हो चुकी थी। बालक कौन सी घड़ी में पैदा होगा तो उसके साथ क्या होगा ? इसी चिंता में कौशल्या माता चिंतित भी नजर आती है, लेकिन रामचंद्र जी आए ऐसे वक्त पर ,जब एक अद्भुत संयोग बना ना सुबह थी ना शाम थी मध्य भाग था। इस अद्भुत संयोग में उनकी कुंडली में संघर्षपूर्ण यात्रा से सफलता का मार्ग तय करने की बात कही गई ।यही कारण था कि राजघराने  अयोध्या जैसी नगरी में पैदा होने के बाद भी उन्हें वनवास काटना पड़ा। एक राजकुमार होकर एक सामान्य इंसान के सभी कार्य करने पड़े। क्या सिखाता है हमें यह सब? राम आज के युवाओं का आदर्श बने तो कोई भी संघर्ष से ना कतराए। किंतु ऐसा आज हो नहीं रहा। धर्म के नाम पर युवाओं को भ्रमित किया जा रहा है। राम की कथा सफलता के लिए संघर्ष का मूल मंत्र देती है। हम इसे क्यों नहीं सीखते?

राम का असाधारण से साधारण बनना ही असाधारण हो जाना है। 

किसे नहीं पता था राम साधारण पुरुष नहीं ,वे तो अवतार के रूप में है। लेकिन यही तो महान पुरुष की पहचान होती है। असाधारण, असामान्य परिस्थितियों में साधारण और सामान्य हो जाना कोई छोटी बात नहीं ,मानव का महामानव बनने की यह प्रक्रिया ही पुरुष को पुरुषोत्तम बनाती है । जहां मर्यादा का समावेश हो जाता है तब वह मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी के रूप में प्रगट होता है। मर्द की मर्दानगी का सच्चा प्राकट्य श्रीराम है। प्राण जाए पर वचन ना जाए। आज भी जब कोई अपने वचनों पर कायम रहता है तब वह इन्हीं शब्दों को दोहराता है ।वचन शब्दों का हमारे समाज में क्या महत्व है यह अगर सीखना है तो राम से ,राम के चरित्र से सीखें। पुरुष जिसमें धैर्य की कमी होती है। उस धैर्य को धारण करने वाला कोई और नहीं मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ही है। क्यों नहीं हम अपने आज के युवाओं को यह शिक्षा दें और उन्हें शिक्षा देने से पहले स्वयं इस पर कार्य करें। तब आएगा सच्चा रामराज्य।

आदिवासी और हाशिए पर छोड़ देने वालों के साथ।
 श्री राम सबका उद्धार करने वाले हैं। जिन्होंने दंडकारण्य के जंगल में शबरी के झूठे बेर खाकर यह चरितार्थ किया  कि वे आदिवासियों का भी उतना ही सम्मान करते हैं। उधर ताड़क वन में ताड़का मारी गौतम न्यारी अहिल्या प्यारी। पंक्तियों को चरितार्थ करते हुए उन्होंने पत्थर बन चुकी अहिल्या का उद्धार किया। अर्थात वे नारियों का भी सम्मान करते थे। यह उदाहरण है। दया , ममता,करुणा के सागर श्रीराम से किसी का भी दुख दर्द नहीं देखा जाता था। केवट मल्हार से लेकर धोबी तक सभी की बातें सुनी ऐसे श्रीराम सभी का कल्याण करने अयोध्यापुरी में जन्मे।

प्रकृति पर्यावरण प्रेमी।

राज महलों में जन्म लेने वाला लाड प्यार से राजसी सुख भोगने वाले श्री राम प्रकृति और पशु प्रेमी भी कम नहीं थे। जिसका साक्षात उदाहरण दंडकारण्य के जंगल और रामसेतु के निर्माण में दिखाई देता है। सामर्थ्यवान होने के बाद भी उन्होंने त्रिलोक विजय धारी रावण के विरुद्ध भालू, बंदर, जटायु, रिछ जैसे जानवरों को युद्ध में शामिल किया । यही नहीं रामसेतु के निर्माण में जब एक नन्हीं गिलहरी आगे आई ।तब राम उसे देख कर मुस्कुराए और अपनी हथेलियों पर उसे रखकर सहलाने लगे।जो संकेत है। प्रकृति को हमेशा सम्मानित  और संरक्षित करने का ।कोई कितना भी ताकतवर बन जाए। लेकिन प्रकृति के विरुद्ध नहीं जा सकता। प्रकृति के प्रति आदर सम्मान ,सह अस्तित्व ,सामंजस्य और सौहार्दपूर्ण भावना का जीता जागता उदाहरण है श्री राम।

क्रांति के बिना शांति नहीं।

इतिहास गवाह है कि बिना क्रांति के कभी भी शांति की स्थापना नहीं हुई। राम को भी धर्म की स्थापना के लिए हथियार उठाना पड़ा? *कांटेहि पइ कदरी फरई कोटि जतन कोइ सींच। विनय न मान खगेस सुनु डोहहि पइ नव नव नीच।।* क्या समुंद्र ने शांति से रास्ता दिया? काकमुसंडी जी कहते हैं। हे गरुड़ जी सुनिए ,चाहे कोई करोड़ों उपाय करके सींचे, पर केला तो काटने पर ही फलता है। नीच विनय नहीं मानता ।वह डांटने पर ही सुधरता है। इसी प्रकार,क्या रावण ने राम का प्रस्ताव स्वीकार किया? यदि वह स्वीकार कर लेता तो क्या महासंग्राम होता? अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी जिन्होंने अनेक असहयोग आंदोलन ,सविनय आंदोलन, भूख हड़ताल नाना प्रकार के जतन किए लेकिन अंत में करो या मरो का नारा ही काम आया। *अमेरिका के प्रसिद्ध राष्ट्रपति निक्सन का भी कथन है बिना क्रांति शांति संभव नहीं।

सहनशीलता का अत्यधिक बढ़ जाना कायरता होता है।

ऐसे में कोई भी महापुरुष जब बात स्वाभिमान, मनुष्यता, नैतिक गुणों की आती है । तब समझौते की बजाए युद्ध करना बेहतर समझता है। ऐसे में मर्यादा के रथ पर सवार होकर मर्यादा पुरुषोत्तम राम रावण से युद्ध करने निकले। उनके दृढ़ संकल्प और सत्व गुण ने ही  उन्हें विजय दिलाई। संघर्ष, संकल्प ,सहनशीलता की मूर्ति राम वास्तव में एक आदर्श पुरुष है। जो विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्यवान ,शांत, संयमित रहने का आव्हान करते हैं। ऐसे राम जिनका सब कुछ बिखर गया था फिर भी वे संघर्ष के पथ पर अग्रसर रहे ।द्वंद की स्थिति में भी जिन्होंने अपना विवेक और बुद्धि नहीं खोया। वे श्रीराम जो ईश्वाकु  वंश में उत्पन्न हुए सूर्यवंशी कहलाए।

नाम की महिमा

राम असाधारण, असीमित अपरिमित, अद्भुत है। इसका साक्षात उदाहरण राम के नाम में मिलता है। राम का नाम राम से भी बड़ा है। उसी राम की महिमा इतनी अद्भुत है कि रामसेतु के निर्माण में राम नाम के पत्थर भी तिर जाते हैं । तो मनुष्य क्या चीज है? जो इस भवसागर से नहीं कर सकता। राम नाम के प्रभाव से तो नीच अजामिल, गज, वैश्य तक भी तिर गए।राम नाम की महिमा अपार, अपरंपार है। राम का विपरीत मरा होता है और अंत समय में राम का नाम ही जिव्हा  पर आता है। यही राम नाम सत्य है।

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