संतान और सौभाग्य की प्राप्ति के लिए वट सावित्री व्रत का विधान है। हिंदू मान्यता के अनुसार इस दिन महिलाएं अपने घर परिवार में सुख- समृद्धि और पति की दीर्घायु के लिए वट सावित्री का व्रत रखती है। जेष्ठ अमावस्या पर आने वाले इस व्रत से एक पुरानी कथा जुड़ी हुई है। संक्षिप्त में कहा जाए तो यमराज से अपने पति के प्राणों को वापस लाने वाली सावित्री एक ऐसी पूजनीय और पतिव्रता नारी थी।
जिसका सत इतना प्रभावी था, कि प्राणों के देवता यमराज को भी उनके आगे झुकना पड़ा।
आज 19 मई को जेष्ठ अमावस्या शनि जयंती और वट सावित्री व्रत है। इस दिन पूजा-पाठ और वट की पूजा करने से सुख- समृद्धि के साथ-साथ वैवाहिक जीवन में प्रेम, सामंजस्य, सहयोग में भी बढ़ोतरी होती है। वट सावित्री के व्रत के साथ-साथ अमावस्या को सम्मान स्वरूप हम अपने पितरों का स्मरण और ध्यान भी करते हैं।
वट सावित्री के दिन महिलाएं वट अर्थात बरगद के नीचे पूजा करती हैं।
सावित्री और सत्यवान की कथा सुनती हैं। पत्तों के गहने पहनती है। मान्यता है कि इस कथा को सुनने से उनके पति की आयु में वृद्धि होती है। उन्हें दीर्घायु प्राप्त होती है। पति की समस्त समस्याओं का समाधान होता है और वैवाहिक जीवन में सुख -समृद्धि, शांति आती है।
एक अपील वृक्ष के नाम
पौराणिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार वट सावित्री अमावस्या को महिलाएं वट वृक्ष की पूजा पाठ करती हैं। लेकिन क्या आपने कभी -कभी देखा है? इस दिन कुछ लोग वटवृक्ष की डाली तोड़कर अपने घर लेकर जाते हैं, क्या यह उचित है?
आप सोचिए, भारत में कितनी महिलाएं हैं, जो वटवृक्ष का व्रत करती हैं शायद लाखों में और अगर इन लाखों महिलाओं में से हजारों महिलाएं अथवा उनके पुरुष इन वटवृक्ष की डालियों को तोड़- तोड़ कर अपने घर लेकर जाएंगे, तो उस पूजा से क्या हमें सौभाग्य वरदान प्राप्त होगा?
शायद नहीं, प्रकृति भी ईश्वर तुल्य है। हमें उसका सम्मान करना चाहिए।
इस दिशा में अगर हमें पूजा-पाठ करनी है, तो स्वयं वटवृक्ष के पास पहुंचे। वृक्ष या उसकी डाल को अपने घर पर तोड़कर ना लाएं। इससे आप महसूस करेंगे ना सिर्फ आपको सौभाग्य और संतान की प्राप्ति होगी। अपितु एक आध्यात्मिक शांति भी महसूस होगी। ऐसे में इस बात का अवश्य ध्यान रखें। आप किसी भी हरे पेड़ पौधे को ना तोड़ें। तभी आपका व्रत और उपवास सार्थक होगा
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