जयपुर। Paul Alexander Iron Lung के बारे में खबर सुनकर हर कोई हैरान है। क्योंकि पॉल अलेक्जेंडर वो शख्स हैं जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी लोहे फेफड़ों के सहारे निकाल दी। हालांकि, अब उनकी मौत हो गई जिससें पूरी दुनिया उनके बारे में जानने की कोशिश कर रही है। Paul Alexander Iron Lung Death 12 मार्च को हो गई। इसकी जानकारी पॉल अलेक्जेंडर के GoFundMe पेज पर की गई।
70 साल लोहे के फेफड़ों से जी जिंदगी
आपको बता दें कि पॉल अलेक्जेंडर (Paul Alexander Iron Lung) अमेरिका के रहने वाले थे जिनका जन्म 1946 में हुआ था। उनको बचपन में ही पोलियो हो गया था जिससें ठीक होने के बाद उनके फेफड़े खराब हो गए। हालांकि, उनको लोहे के फेफड़े लगाए गए जिनके सहारे वो 70 वर्षों से अधिक समय तक जिंदा रहे।

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लोहे के फेफड़ों के सहारे ऐसे काटी जिंदगी
लोहे के फेफड़े के अंदर रहे पॉल अलेक्जेंडर (Paul Alexander Iron Lung) ने कभी अपनी जिंदगी से हार नहीं मानी। वो लोहे के फेफड़ों के सहारे ही कॉलेज गए जिसके बाद वो वकील और एक प्रकाशित लेखक बने। पॉल की जिंदगी की कहानी पूरी दुनिया में फैली और वो लोगों के लिए एक मिसाल बन गए। पॉल लोगों के लिए एक अविश्वसनीय रोल मॉडल के रूप में स्थापित हो चुके थे। क्योंकि अलेक्जेंडर को 1946 में पैदा होने के बाद से कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने अमेरिकी इतिहास में सबसे खराब पोलियो प्रकोप को सहन किया।
सांस लेने के लिए लगाए गए लोहे के फेफड़े
पोलियो बीमारी ने अलेक्जेंडर को गंभीर रूप से प्रभावित किया था जिसके बाद उन्हें सांस लेने के लिए मशीन का उपयोग करना पड़ा। इसके बाद पॉल को लोहे के फेफड़ा वाला शख्स (Paul Alexander Iron Lung) कहा जाने लगा। दरअसल, पॉल को पोलियन, या पोलियोमाइलाइटिस, पोलियोवायरस के कारण होने वाली एक अक्षम्य और जीवन-घातक बीमारी लगी थी। यह वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है और व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी को संक्रमित कर सकता है, जिससे पक्षाघात हो सकता है। इससे अलेक्जेंडर सांस लेने में बहुत कमजोर हो गए थे। इसके बाद उनकी एक आपातकालीन ट्रेकियोटॉमी की गई और उन्हें लोहे के फेफड़े में रखा गया। तब से वह जीवित रहने के लिए गर्दन से पैर तक की मशीन पर निर्भर रहे।

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ऐसे काम करते हैं लोहे के फेफड़े
Iron Lung यानि लोहे फेफड़े तकनीक का उपयोग करते हैं। यह गले की मांसपेशियों का उपयोग करके वायु को स्वर रज्जु के पार ले जाता है, जिससे रोगी को एक समय में एक कौर ऑक्सीजन निगलने में सहायता मिलती है और यह प्राण वायु को गले से नीचे और फेफड़ों में धकेलती है।